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बुद्ध पूर्णिमा 18 मई को, 502 साल बाद दुर्लभ योग में मनाया जाएगा भगवान बुद्ध का जन्मोत्सव

भोपाल। वैशाख मास की पूर्णिमा पर भगवान गौतम बुद्ध की जयंती मनाई जाती है। शनिवार 18 मई को बुद्ध पूर्णिमा है। इस साल बुद्ध पूर्णिमा पर मंगल-राहु मिथुन राशि में रहेंगे और उनके ठीक सामने शनि-केतु धनु राशि में स्थित हैं। सूर्य और गुरु भी एक-दूसरे पर दृष्टि रखेंगे।

ज्योतिषाचार्य पं. दीपेश पाठक ने बताया कि बुद्ध पूर्णिमा पर ऐसा दुर्लभ योग 502 साल पहले 16 मई 1517 में बना था। उस समय भी मंगल-राहु की युति मिथुन में थी और शनि-केतु की युति धनु राशि में थी। इस संयोग में ही बुद्ध पूर्णिमा का पर्व मनाया गया था। आगे ऐसा संयोग 205 वर्ष बाद 2 जून 2224 को बनेगा।

ग्रहों के दुर्लभ संयोग का ये होगा असर

पं. पाठक ने बताया कि बुद्ध पूर्णिमा पर बन रहे दुर्लभ योगों के असर की वजह से महंगाई में बढ़ोतरी हो सकती है। पूर्णिमा पर विशाखा नक्षत्र रहेगा, इसका स्वामी गुरु है। नवांश में भी शनि की दृष्टि सूर्य पर होगी, इससे विश्व के किसी हिस्से में भूकंप के योग बन रहे हैं। अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी आ सकती हैं।

इसलिए महत्वपूर्ण है यह दिन

पं. अभिषेक भारद्वाज ने बताया कि बौद्ध धर्म को मानने वाले विश्व में 50 करोड़ से अधिक लोग इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं। हिंदू धर्मावलंबियों के लिए भगवान बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। अत: हिंदुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है।

बिहार स्थित बोधगया नामक स्थान हिंदू व बौद्ध धर्मावलंबियों का पवित्र तीर्थ स्थान है। गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सात वर्षों तक वन में भटकते रहे। यहां उन्होंने कठोर तप किया और अंतत: वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है।

इस दिन क्या-क्या कर सकते हैं

पूर्णिमा तिथि का 18 मई की सुबह 4.10 बजे से शुरू हो रही है। यह तिथि रात को 2.41 बजे तक रहेगी। इस पूर्णिमा को वैशाखी पूर्णिमा भी कहा जाता है। प्राचीन समय में भगवान बुद्ध का जन्म इसी तिथि पर हुआ था इसीलिए इसे बुद्ध पूर्णिमा कहते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार धारण किया था।

वैशाख मास के स्नान भी इसी दिन से समाप्त हो जाएंगे। पूर्णिमा पर पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। स्नान के बाद गरीबों को धन का दान करें और व्रत करें। इस तिथि पर भगवान सत्यनारायण की कथा भी करनी चाहिए। शिवलिंग पर तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं, चांदी के लोटे से दूध चढ़ाएं। ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें।

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