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जगन्नाथ रथयात्रा कल: पौराणिक कथा के साथ जानिए कुछ रोचक बातें

पुरी। 25 जून रविवार से भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का आरंभ हो रहा है। जिसमें वो अपने भाई बलराम जी और बहन देवी सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर गुण्डीचा मंदिर में जाएंगे। भारतीय जनमानस की भक्ति के प्राणाधार श्री कृष्ण का सबसे दयालु स्वरूप भगवान जगन्नाथ हैं। भगवान जगन्नाथ अर्थात भक्त के नाथ, जगत के नाथ दयालु भगवान। इस स्वरूप में विशाल नेत्रों के साथ बांहें पसारे भगवान जगन्नाथ भक्त को अपने आलिंगन में लेने के लिए उसे पुकार रहे हैं। भगवान जगन्नाथ रथयात्राओं के आयोजन का वास्तविक अर्थ भक्त एवं भगवान का परस्पर साक्षात्कार और वास्तविक मिलन है।


जगन्नाथ रथयात्रा शुरू होने की पौराणिक कथा

लगभग 5000 वर्ष पूर्व द्वापर युग में लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण जब वृंदावन त्याग कर द्वारिका नगरी में अपनी पत्नियों संग निवास कर रहे थे, तभी एक बार पूर्ण सूर्य ग्रहण का विरल अवसर आया। इस अवसर पर सभी यदुवंशियों ने कुरुक्षेत्र स्थित समन्त पंचक नामक पवित्र तीर्थ पर एकत्रित होने तथा वहां स्नान, उपवास, दान आदि करके अपने पापों का प्रायश्चित करने का निश्चय किया।


निश्चय के अनुरूप समस्त द्वारिका वासियों ने श्री कृष्ण के नेतृत्व में कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया। वियोगिनी राधा रानी एवं वृंदावन वासियों को जब श्री कृष्ण के कुरुक्षेत्र आने का पता चला तो उन्होंने नन्द बाबा के नेतृत्व में श्री कृष्ण के दर्शनार्थ कुरुक्षेत्र जाने का निश्चिय किया।


इतने वर्षों के पश्चात भक्त शिरोमणि राधा रानी तथा गोपियों ने श्री कृष्ण को देखकर परम आनंद अनुभव किया किन्तु कुरुक्षेत्र का वातावरण तथा श्री कृष्ण की राजसी वेशभूषा राधा रानी के प्रेम में अवरोधक थी। वह बीते समय की भांति श्री कृष्ण के साथ वृंदावन की कुंज गलियों में विहार तथा मिलन के लिए लालायित थीं।


इसी लालसा के वशीभूत राधा जी ने श्री कृष्ण को वृंदावन आने का निमंत्रण दिया। परम कृपालु भगवान श्री कृष्ण ने निमंत्रण स्वीकार किया तो वृंदावन वासी प्रसन्नता से झूम उठे और रथ पर सवार होकर वृंदावन के लिए तैयार हो गए। जिस रथ पर श्री कृष्ण तथा उनके बड़े भाई बलराम तथा मध्य में बहन सुभद्रा आरूढ़ थीं, उस रथ के घोड़े ब्रजवासियों ने खोल दिए तथा घोड़ों के स्थान पर स्वयं जुत गए। वृंदावन वासियों ने परम भगवान श्री कृष्ण को तब प्रथम बार भगवान जगन्नाथ (जगत के नाथ) का नाम दिया। आकाश जय जगन्नाथ, जय बलदेव, जय सुभद्रा के उदघोषों से गूंज उठा।

भक्तों का अभूतपूर्व प्रेम देखकर परम भगवान श्री कृष्ण ने कहा, ‘‘जब तुम मेरे घोड़े (दास) बन ही गए हो तो अब तुम मुझे जहां चाहे ले चलो।’’


इस प्रकार सब ब्रजवासी मिलकर भगवान श्री कृष्ण के रथ को स्वयं खींचकर तीनों भाई-बहन की जय जयकार करते हुए वृंदावन धाम तक ले गए। इस सारी लीला को जगन्नाथ रथयात्रा के नाम से जाना जाने लगा।


लेकिन श्री कृष्ण प्रेम एवं भक्ति की यह लीला उसी दिन समाप्त नहीं हो गई बल्कि श्री जगन्नाथ रथयात्रा उसी कृष्ण प्रेम के साथ जगन्नाथ पुरी उड़ीसा में निकलनी शुरू हुई जहां लाखों भक्तों ने रथयात्राओं में भाग लेना शुरू किया।


श्री कृष्ण भक्तों को रथयात्राओं के साथ जोड़े रखने के लिए 20वीं शताब्दी में महान संत एवं इस्कॉन के संस्थापक आचार्य श्रील प्रभुपाद ने प्रयास शुरू किए। इसी कड़ी में उन्होंने 9 जुलाई 1967 को अमेरिका में सान फ्रांसिस्को की धरती पर जगन्नाथ रथयात्रा का आयोजन किया। तब से लेकर आज तक सान फ्रांसिस्को में यह दिन राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है।