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'द फैमिली मैन' : सस्पेंस और एडवेंचर से भरी है सीरीज, मनोज बाजपेयी और समांथा ने किया उमदा अभिनय

नई दिल्ली। 'द फैमिली मैन' के बाद तक़रीबन 20 महीनों का इंतज़ार और हाज़िर हैं श्रीकांत तिवारी दूसरे सीज़न के साथ। 20 सितम्बर 2019 से लेकर 3 मई 2021 तक हमारी-आपकी ज़िंदगी के बीस महीने गुज़रे हैं, मगर श्रीकांत की ज़िंदगी सिर्फ़ एक बरस आगे ही खिसकी है।

हम और आप इन 20 महीनों में कोरोना वायरस की दो लहरों की मार झेलते रहे हैं, मगर श्रीकांत की दुनिया में अभी मास्क की ज़रूरत नहीं पड़ी है... लेकिन आगे पड़ने वाली है। श्रीकांत को भी मास्क पहनना पड़ेगा। हालांकि, यह देखने के लिए हमें फिर थोड़ा इतंज़ार करना होगा। सही समझ रहे हैं। दूसरे सीज़न के अंत में इशारा मिल गया है कि इस सदी की सबसे डरावनी साजिश का पर्दाफाश करने श्रीकांत तिवारी एक बार फिर लौटेगा, वो भी कोलकाता में। बहरहाल, हम लौटते हैं मौजूदा सीज़न पर और झांकते हैं श्रीकांत की दुनिया में। सीक्रेट इंटेलीजेंस संस्था T.A.S.C का सीनियर एनालिस्ट श्रीकांत तिवारी दिल्ली गैस रिसाव की घटना में मारे गये दर्जनों मौतों का बोझ अपनी आत्मा पर लिए कॉरपोरेट जॉब कर रहा है। इसी बहाने अपनी पारिवारिक ज़िंदगी को पटरी पर लाने की नाकाम कोशिश कर रहा है। मगर, दिल और दिमाग अभी भी टास्क में लगा है। सहकर्मी और दोस्त जेके तलपड़े से अक्सर अपने पिछले ऑफ़िस और काम की खोज-ख़बर लेता रहता है। पहले एपिसोड में यह भी खुलासा होता है कि दिल्ली में गैस रिसाव की घटना के बाद क्या हुआ था।

द फैमिली मैन के दूसरे सीज़न की कहानी वैसे तो मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, श्रीलंका, लंदन, फ्रांस के बीच डोल रही है, मगर मुख्य कथाभूमि चेन्नई ही है। श्रीलंका के उत्तरी इलाक़े में तमिल विद्रोहियों ने अपनी गवर्मेंट इन एग्ज़ाइल (Government in exile) घोषित कर दी है। इस सरकार का मुखिया भास्करन है, जो अपने विश्वासपात्र दीपन और छोटे भाई सुब्बु के साथ मिलकर तमिल भाषियों के लिए अलग देश की लड़ाई लड़ रहा है। विद्रोही हथियार और डिप्लोमेटिक दोनों तरीक़ों से अपनी जंग लड़ रहे हैं।

फ्रांस और यूके विद्रोहियों की गवर्मेंट इन एग्ज़ाइल को मान्यता देने वाले हैं। इनकी कोशिश है कि अगर भारत इनकी सरकार को मान्यता दे दे तो अलग तमिल देश की दावेदारी मजबूत हो जाएगी। श्रीलंका में विद्रोहियों के कैंप पर श्रीलंकाई सेना का बड़ा हमला होता है, जिसके बाद भास्करन और दीपन लंदन भाग जाते हैं, जबकि सुब्बु चेन्नई में छिपकर सहानुभूति रखने वाले राजनेताओं के ज़रिए उनकी गवर्मेंट इन एग्ज़ाइल को मान्यता देने के भारतीय प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

उधर, चीन उत्तरी श्रीलंका में एक पोर्ट बनाना चाहता है, जो भारत की सुरक्षा के लिए ख़तरा हो सकता है। हिंद महासागर में चीन के प्रभुत्व को रोकने के लिए भारत किसी भी क़ीमत पर यह नहीं होने देना चाहता। भारतीय प्रधानमंत्री बसु श्रीलंका के प्रधानमंत्री रूपातुंगा को पोर्ट का निर्माण करने का ऑफर देती हैं, मगर श्रीलंकाई पीएम शर्त रखते हैं कि वो भारत को पोर्ट बनाने देंगे, मगर इसके लिए उन्हें रिबेल सुब्बु को श्रीलंका को सौंपना होगा, जो चेन्नई में छिपा हुआ है।

इंटेलीजेंस एजेंसियों के मना करने के बावजूद प्रधानमंत्री इसके लिए तैयार हो जाती हैं। सुब्बु को पकड़ लिया जाता है। उधर, पहले सीज़न में असफल होने के बाद आईएसआई अब भास्करन के ज़रिए भारत में अस्थिरता फैलाना चाहती है। इसके लिए मेजर समीर अपने गुर्गे साजिद के साथ मिलकर साजिश रचता है और सुब्बु की हत्या करवा देता है। भास्करन को लगता है कि इसके लिए भारतीय प्रधानमंत्री ज़िम्मेदार हैं।

भास्करन, गवर्मेंट इन एग्ज़ाइल के प्रधानमंत्री का पद छोड़कर दीपन को पीएम बना देता है और ख़ुद अपने विश्वासपात्रों और आईएसआई के साथ मिलकर भारतीय और श्रीलंकाई पीएम की हत्या की साजिश रचता है, जो चेन्नई में एक समझौते के लिए मिलने वाले होते हैं। इस साजिश का अहम मोहरा राजी है, जो एक प्रशिक्षित और ख़तरनाक सोल्जर है।

उधर, अपने कई साल छोटे बॉस की रोज़-रोज़ की डांट और पत्नी के साथ बढ़ती दूरी से तंग आकर श्रीकांत नौकरी छोड़कर टास्क में लौट जाता है और फिर अपनी टीम के साथ मिलकर चेन्नई में भास्करन की साजिश नाकाम करने में जुट जाता है। क्या श्रीकांत राजी को रोक पाता है? तमिल विद्रोहियों की गवर्मेंट ऑफ़ एग्ज़ाइल का क्या भविष्य होता है? क्या श्रीकांत आईएसआई के मंसूबों को एक बार फिर विफल कर पाता है? क्या श्रीकांत अपने परिवार के बिखराव को रोक पाता है? ऐसे तमाल सवालों के जवाब द फैमिली मैन 2 के नौ एपिसोड्स की कहानी बुनते हैं।

द फैमिली मैन का दूसरा सीज़न पहले सीज़न की तरह कसा हुआ है, जिसका श्रेय स्क्रीनप्ले लेखक सुमन कुमार को जाता है। सुमन ने अपने स्क्रीनप्ले के ज़रिए इतने सारे किरदारों और घटनाक्रमों को बेहद तरलता और सरलता के साथ सीन-दर-सीन पिरोया है।

राजनीति की कम समझ रखने वाले दर्शक के लिए भी घटनाक्रमों को समझना मुश्किल नहीं लगता। दृश्यों को तैयार करने में बारीकियों पर ध्यान दिया गया है, जो इसे वास्तविकता के क़रीब ले जाता है। मनोज बाजपेयी ने एक बार फिर श्रीकांत तिवारी के किरदार में कमाल किया है। ख़ासकर, जेके के किरदार में शारिब हाशमी के साथ मनोज के हल्के-फुल्के और संजीदा दृश्य सीरीज़ का हाई पॉइंट हैं।

सीरीज़ की एक और बात, जिसने मुझे प्रभावित किया, वो है इसकी भाषा। द फैमिली मैन 2 को द्विभाषी रखा गया है। तमिल किरदार पूरी सीरीज़ में तमिल में बोलते है, जिसे अंग्रेज़ी में अनुवाद करके सबटाइटल्स में दिया गया है। अगर तमिल किरदार हिंदी भी बोल रहे हैं तो उनका उच्चारण बिल्कुल वास्तविक है, जो दृश्यों को नाटकीय और हास्यास्पद होने से बचाता है।

हिंदी के संवाद निर्देशक सुपर्ण एस वर्मा ने लिखे हैं, जबकि तमिल संवाद मनोज कुमार कलईवनन ने लिखे हैं। सुपर्ण ने संवादों को सहज और हक़ीक़त के क़रीब रखा है। मिसाल के तौर पर, एक जगह तमिल विद्रोहियों से सहानुभूति रखने वालों के बारे में विमर्श करते हुए श्रीकांत कहता है- दुनियाभर में टेररिज़्म की डेफिनिशन समय-समय पर बदलती रहती है। जिसकी सरकार उसकी पॉलिसी।

सीरीज़ की सहयोगी स्टार कास्ट ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। मिलिंद के किरदार में सनी हिंदूजा, प्रधानमंत्री के किरदार में सीमा विस्वास, सचिव संबित के रोल में विपिन शर्मा ने बेहतरीन काम किया है। दिवगंत कलाकार आसिफ़ बसरा मैरिज काउंसलर के किरदार में दिखे। मनोज बाजपेयी, प्रिया मणि और आसिफ़ के दृश्य मज़ाकिया होने के साथ-साथ वैचारिक स्तर पर परिपक्वता लिये हुए हैं।

वहीं, तमिल कलाकारों का अभिनय इस सीरीज़ की जान है। फिर चाहे वो भास्करन के किरदार में मीमे गोपी हों या सेल्वा के किरदार में आनंदसामी या फिर दीपन के किरदार अज़ागम पेरुमल। ख़ुद सुपर्ण ने एक जर्नलिस्ट के रोल में और क्रिएटर कृष्णा डीके ने प्रिया मणि और शरद केल्कर के बॉस के रोल में कैमियो किया है।

तमिल और तेलुगु फ़िल्मों की सक्षम अभिनेत्री सामंथा अक्कीनेनी इस सीरीज़ के दूसरे सीज़न की खोज कही जा सकती हैं। राजी के किरदार की विभिन्न परतों में सामंथा का अभिनय देखने लायक है। आंखों में वीरानी लिए बेहद कम बोलने वाली राजी के दर्द और छटपटाहट को सामंथा ने कामयाबी के साथ उकेरा है। सीरीज़ के छठे एपिसोड में पहली बार मनोज बाजपेयी और सामंथा के किरदार आमने-सामने आते हैं। इन दृश्यों में राजी के दुस्साहस और तेवरों को सामंथा ने पूरी शिद्दत से जीया है।

अब अगर सीरीज़ के नेगेटिव पहलुओं की बात करें तो द फैमिली मैन 2 की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसका प्लॉट ही है, जिसके लिए भारतीय राजनीति के एक ऐसे चैप्टर को उठाया गया है, जिससे इस देश का बच्चा-बच्चा वाकिफ़ है और इसी वजह से दूसरे सीज़न की कहानी काफ़ी हद प्रेडिक्टेबल हो जाती है।

सीरीज़ के कुछ ट्विस्ट्स घिसे-पिटे और देखे हुए लगते हैं, जिनसे बचा जा सकता था। मगर, स्क्रीनप्ले में दृश्यों की बेहतरीन बुनावट ने इस कमी को ढक दिया है। पहले सीज़न के मुक़ाबले दूसरा सीज़न इसी मोर्चे पर मात खाता है। हालांकि, यह प्रेडिक्टेबिलिटी दर्शक को बिंज वॉच करने से नहीं रोक पाती और यही द फैमिली मैन सीज़न 2 की सबसे बड़ी जीत है।

कलाकार- मनोज बाजपेयी, शारिब हाशमी, सामंथा अक्कीनेनी, सीमा बिस्वास, विपिन शर्मा, प्रिया मणि, शरद केल्कर, सनी हिंदूजा, दलीप ताहिल, दर्शन कुमार, शहाब अली आदि।

निर्देशक- सुपर्ण एस वर्मा

क्रिएटर्स- राज निदीमोरू, कृष्णा डीके (डी2आर फ़िल्म्स)

अवधि- प्रति एपिसोड 40 मिनट-1 घंटा

स्टार- *** (3 स्टार)

 

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